भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली स्वरूप सुधार और योग

 

राजेश त्रिपाठी

योग विभाग, गोविन्द गुरू जनजातीय विश्वविद्यालय, बांसवाड़ा, राजस्थान, भारत।

*Corresponding Author E-mail: pksahu901@gmail.com

 

ABSTRACT:

शिक्षा मानव के लिए अति आवश्यक अंग हैं। बिना शिक्षा के मानव पशु की भाँति होता है। शिक्षा के स्वरूप एवं प्रणाली में कई विषमताएँ देखने को मिलती हैं जिन्हें योग शिक्षा द्वारा दूर कर श्रेष्ठ नागरिक तैयार किये जा सकते हैं। यदि भारत को पुनः विश्व गुरु बनना है तो उसे अपनी शिक्षा प्रणाली मे सुधार करना चाहिए।

 

KEYWORDS: शिक्षा, योग तप त्याग ।

 

 


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शिक्षा मानव जीवन का मेरुदण्ड है। उसके सर्वांगिण विकास का साधन और जीवन की आधारशिला है। शिक्षा ही मानव बुद्धि की जड़ता को दूर कर उस सम्पूर्ण शक्तियां प्रदान करती है और देश-दशान्तर में उसके यश का प्रसार करती है। कहा भी गया है-  ‘‘स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते।’’ शिक्षा से ही लोक-परलोक की सिद्धि होती है। हितोपदेश में बच्चों को शिक्षा न देने वाले माता-पिता को शत्रु कहा गया है क्योंकि अशिक्षित बालक हंसो के मध्य बगुले के समान शोभा नहीं पा सकता है।

 

प्राचीन भारत में बालकों की शिक्षा के लिए सच्चरित्र और परम् विद्वान गुरुओं के आश्रय या गुरुकुल होते थे। इनमे ब्रह्मचर्य व्रत सहित तप और त्याग संयम का जीवन होता था। वहाँ के शान्त और पावन वातावरण में त्याग, तप, उदारता, विनम्रता स्वावलम्बन जैसे गुणों के साथ उच्च से उच्च शिक्षा प्रदान की जाती थी। शिक्षा का उद्देश्य लौकिक सफलता के साथ परमार्थ सिद्धि भी थी।

 

भारत की आधुनिक शिक्षा पद्धति का जन्म और विकास भी अन्य आधुनिक पद्धतियों के समान अंग्रेजों के साम्राज्यवादी हितों के संरक्षण में परतंत्र भारत में हुआ। इस शिक्षा पद्धति के जनक लार्ड मेकाले ने इस शिक्षा के उद्देश्य की घोषणा करते हुए कहा था ‘‘मेरा उद्देश्य इस शिक्षा से केवल यही है कि भारत के अधिक से अधिक र्क्लक पैदा हों और भारत बहुत दिनो तक हमारा गुलाम बना रहे।’’

 

मैकाले का यह कथन आज भी भारतीय स्वतंत्रता के अठ्हत्तर वर्षों के बाद भी हमारी शिक्षा पद्धति पर चरितार्थ होता है। यद्यपि स्वतंत्र भारत में कई शिक्षा समितियों का गठन हुआ और उसके परामर्शों से शिक्षा की विविधता और व्यापकता के साथ साथ कई नए-नए रुप दिये गये। आज भी भारतीय शिक्षा पद्धति आमूलचूल परिवर्तन की अस्थिर मानसिकता के दौर से गुजर रही है। 

 

वर्तमान व्यवस्था के अन्तर्गत शिक्षा को त्रिस्तरीय रखा गया है - आरम्भिक शिक्षा हेतु प्राइमरी स्कूल, माध्यमिक (सैकन्डरी) शिक्षा हेतु माध्यमिक शाला, स्नातक और स्नात्तकोत्तरीय उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज और विश्वविद्यालय। विश्वविद्यालय में उच्चतर शिक्षा में शोध और अनुसंधान की व्यवस्था भी है। प्राविधिक शिक्षा के लिए पोलोटेक्निकल, इन्जिनियरिंग और मेडिकल कॉलेज या संस्थान खुले हुए हैं जिनमें हायर सैकण्डरी या इन्टर के बाद चार-पांच साल का प्राविधिक प्रशिक्षण दिया जाता है। उधर शैक्षणिक विषयों की भी विस्तृत व्यापकता है। कला, साहित्य भाषा, सामाजिक शास्त्र, दर्शन इतिहास, वाणिज्य विज्ञान और तकनीक उच्चतम शिक्षा आज विश्वविद्यालयो द्वारा प्रदान की जाती है। उच्चतम शिक्षा के विकास और व्यवस्था के लिए एक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग है। व्यस्क या प्रौढ़ शिक्षा का कार्यक्रम पृथक से चलता है। शिक्षा के सभी स्तरों पर छात्रों के शारिरिक विकास के लिए विभिन्न खेलकुदों की व्यवस्था है। जीवन में अनुशासन के विकास और राष्ट्रीय धारा में छात्रों को जोडने की प्रक्रिया में एन.सी.सी., स्काउट्स,    एन.एस.एस. आदि राष्ट्रीय स्तर के संगठन भी काम करते हैं। मानसिक विकास के लिए विविध सास्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते रहते हैं। इस प्रकार सिद्धान्त रूप में छात्रों के बौद्धिक, शारीरिक और मानसिक सम्पूर्ण विकास का पूर्ण प्रबन्ध इस शिक्षा प्रणाली में किया गया। निश्चित ही देश की सामाजिक चेतना ओर राजनितिक जागृति में इस शिक्षा का अपूर्व योगदान रहा है।

 

लेकिन व्यवहारिक रूप से यह शिक्षा प्रणाली भारतीय जीवन की आकांक्षाओं और सफलता से बहुत दूर है। सत्रांत में परीक्षा होती है और तदनुसार छात्रों को श्रेणियाँ दी जाती हैं। डिग्रीयाँ लेकर ‘शिक्षित’ नौकरी का संघर्ष करता है- र्क्लकों की एक लम्बी जुझती हुई कतार। मेकाले आज भी इस शिक्षा-पद्धति में विद्यमान दृष्टिगत होता है। शिक्षा, जिसका परम उद्देश्य अच्छी नौकरी और अर्थाजन है।

 

दूसरे, आज के छात्र या शिक्षित व्यक्ति को देखकर ऐसा लगता ही नहीं कि वह शिक्षित है। वह प्रायः मानसिक, बौद्धिक और शारीरिक विकास की दृष्टि से कोरा होता है। सारा ज्ञान परीक्षा से जुड़ी हुई व्यावसायिक कुंजियों में सिमटकर रह गया है। आज का छात्र प्राचीन शिक्षा प्रणाली के सारे वांछनीय आदर्शो से रहित है। वह न सच्चरित्र है, न विनय, न अनुशासनबद्ध, न स्वावलम्बी, सात्विकता और सादगी, तो उससे कोसों दूर है। लेकिन इसमें छात्रों का दोष नहीं है। ये सारे सद्गुण, हमारे सामाजिक जीवन से भी लुप्त हो गए हैं। शिक्षण भी जीविका से जुड़ा होने के कारण पुराना ‘आदर्श’ प्रस्तुत नहीं कर सकता। परिमाणतः आज के भारतीय विद्यार्थी उच्छृंखलता, तोड़-फोड, हिंसा, उपरी चमक-दमक और यौनाचार, आपसी वैमनस्य और द्वेष आज के छात्र जीवन के प्रमुख अंग हैं। शिक्षकों का आये दिन अपमान होता है। छात्र बलप्रयोग से नकल करके ‘उपाधि’ पाना चाहते हैं, डिग्री सिर्फ डिग्री और कुछ नहीं। आज की शिक्षा-पद्धति शिक्षा के प्रभाव तथा ग्लेमर युक्त किन्तु खोखली चलचित्र परम्परा से अधिक जुड़ी हुई है। सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों के हृास ने हमारी सारी शिक्षा प्रणाली का मखोल बना दिया दिया है।

 

अतः आज के शिक्षाविदों को शिक्षा-पद्धति पर पुर्नविचार “ करना होगा जिससे आधुनिक वातावरण के अनुकुल एक सार्थक शिक्षा-प्रणाली की व्यवस्था हो सके। सबसे पहले तो संस्कृति और जीवन की आवश्यकताओं से जोड़ना होगा। होगा। ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा स्थापित शिक्षा व्यवस्था परिवर्तित एवं स्वतंत्र भारत के लिए अपर्याप्त है। साथ ही हमें अपने सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का स्तर निश्चित करना होगा। शिक्षा का समाज और संस्कृति के क्षेत्र से बाहर कोई महत्व नहीं है। प्राचीन सच्चरित्रता स्वावलम्बन का ेशिक्षा में अनिवार्य रूप से जोड़ा जाना चाहिए। प्राचीन परीक्षा प्रणाली में भी व्यवहारिक शिक्षा की आवश्यकतानुसार परिवर्तन करना होगा। इसके लिए वस्तुनिष्ठ परीक्षण और सेमेस्टर प्रणाली जैसे प्रयोग किये जा रहे हैं।

 

शिक्षा को राजनीति के विष से अलग रखने के लिए प्रयास होना चाहिए। छात्रों को राजनीती में व्यवहारिक दक्षता पानी चाहिए किन्तु राजनितिज्ञों के हाथों में खेलना नहीं चाहिए।

 

शिक्षा में अपूर्व सुधार के लिए प्राथमिक शिक्षण पर अधिक ध्यान देना चाहिए। प्रारम्भ से ही बच्चों को संस्कार देने के लिए यौगिक शिक्षा प्रणाली पर बल देना चाहिए। योग शिक्षा में निहित यम नियम छात्रों में सच्चरित्र का विकास करेंगे।. आसन, प्राणायाम शारीरिक एवं मानसिक रूप से पुष्ठ बनायेगे। ध्यान एवं त्राटक मानसिक एकाग्रता को बढ़ायेंगें। कर्मयोग छात्रों को अकर्मण्य होने से बचायेगा। षटकर्म क्रिया व्यक्ति या शारिरीक, मानसिक शोधन करेगी जिससे शारीरिक एवं मानसिक रोग दूर हो जायेंगे। इस प्रकार जब छात्र योग शिक्षा को जीवन में अंगीकार करेगा तो उसका शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक, भावनात्मक अर्थात सर्वांगीण विकास होगा जिससे वह भारत का एक श्रेष्ठ नागरिक बन सकेगा। उसमे नैतिक गुणों का विकास हो सकेगा। छात्रों में जब योग शिक्षा प्रचार-प्रसार प्रारम्भ से ही होने से उसमें आत्मिक बल बढ़ेगा जिससे सामाज में व्याप्त बुराईयों को देखकर उससे प्रभावित न होकर उसे दूर करने का प्रयास करेगा। स्वयं संस्कारित होकर दूसरों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करेगा। योग शिक्षा राष्ट्रीय और जातिय विकास की आधारशिला है। इस शिक्षा के माध्यम से ही छात्रों में जो अकर्मण्यता, हिंसा, निराशा और उपरी दिखावा आदि जो कुरितियां घर कर रही हैं उसे दूर कर श्रेष्ठ नागरिक बनाने में मददगार रहेगी। योग शिक्षा को शिक्षा प्रणाली का मुख्य अंग बनाकर ही शिक्षा प्रणाली में सुधार हो पायेगा। तभी निःसंदेह भारत पुनः अपने प्राचीन शिक्षा गौरव को प्राप्त कर सकेगा और पुनः विश्व गुरु की उपाधि को प्राप्त कर सकेगा और हमारा राष्ट्रीय जीवन तद्नुसार समुन्नत और विकसित होगा।

 

संदर्भ सूची -

1. शर्मा श्रीराम आचार्य (1963): आत्म विश्वास की शक्ति, अखंड ज्योति संस्थान, मथुरा  26 अंक 12,5 ।

2. मुनि धर्मेश (2002) जीवन विज्ञान की रूपरेखा, जैन विश्व भारती संस्थान लाडनुं (राज.)।

3. नारायण स्वामी उपोद्घात, वैदिक साहित्य प्रचारणी सभा, दिल्ली।

4. भोगल आर. एस., योग और मानसिक स्वास्थ्य कैवल्यधाम, लोनावाला पूणे (महाराष्ट्र)।

5. कर्मयोगी, राजेश (2002) योग और शिक्षा मयंक प्रकाशन, ग्राम दांड़ी पोस्ट सागर सुन्दरपुर प्रतापगढ़ (उ.प्र.) ।

 

 

Received on 11.09.2025      Revised on 01.12.2025

Accepted on 13.01.2026      Published on 17.03.2026

Available online from March 20, 2026

Int. J. Ad. Social Sciences. 2026; 14(1):36-38.

DOI: 10.52711/2454-2679.2026.00009

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